१. शुभ कर्म करो ! अशुभ कर्मो में सहयोग न दो ! कोई पाप कर्म न करो !
२. यही बौद्ध जीवन मार्ग है !
३. यदि आदमी शुभ कर्म करे ! तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए ! उसी में चित्त लगाना चाहिए ! शुभ कर्मो का संचय सुखकर होता है !
४. भलाई के बारे में यह मत सोचो कि मै इसे प्राप्त न कर सकूंगा ! बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है ! इसी प्रकार थोडा-थोडा करके बुद्धिमान आदमी बहुत शुभ कर्म कर सकता है !
५. जिस काम को करके आदमी को पछताना न पड़े और जिसके फल को वह आनंदित मन से भोग सके ,उस काम को करना अच्छा है !
६. जिस काम को करके आदमी को अनुताप न हो और जिसके फल को प्रफुल्लित मं से भोग सके ,उस काम को करना अच्छा है !
७. यदि आदमी शुभ कर्म करे ! तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए ! उसे उसमे आनन्दित होना चाहिए !शुभ कर्म का करना आनन्ददायक होता है !
८. अच्छे आदमी को भी बुरे दिन देखने पड़ जाते है ,जब तक उसे अपने शुभ कर्मो का फल मिलना आरम्भ नहीं होता ; लेकिन जब उसे अपने शुभ कर्मो का फल मिलना आरम्भ होता है ,तब अच्छा आदमी अच्छे दिन देखता है !
९. भलाई के बारे में यह कभी न सोचे कि मै इसे प्राप्त न कर सकूंगा ! जिस प्रकार बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है ,उसी प्रकार थोडा-थोडा करके भी भला आदमी भलाई से भर जाता है !
१०. शील (सदाचार ) की सुगंध चन्दन, तगर तथा मल्लिका –सबकी सुगंध से बडकर है !
११. धुप और चन्दन की सुगंध कुछ ही दूर तक जाती है ,किन्तु शील की सुगंध बहुत दूर तक जाती है !
१२. बुराई के बारे में यझ न सोचे कि यह मुझ तक नही पहुचेगी !जिस प्रकार बूंद बूंद करके पानी का घड़ा भर जाता है ,इसी प्रकार थोडा-थोडा अशुभ कर्म भी बहुत हो जाते है !
१३. कोई भी ऐसा काम करना अच्छा नही ,जिसे करने से पछताना हो और जिस का फल अश्रु मुख होकर रोते हुए भोगना पड़े!
१४. यदि कोई आदमी दुष्ट मं से कुछ बोलता है या कोई काम करता है ,तो दुख: उसके पीछे-पीछे ऐसे ही हो लेता है ,जैसे गाडी का पहिया खीचने वाले (पशु)के पीछे पीछे !
१५. पाप कर्म न करें !अप्रमाद से बचें ! मिथ्या दृष्टी न रखे !
१६. शुभ कर्मो में अप्रमादी हो !बुरे विचारों का दमन करें !जो कोई शुभ कर्म को करने में ढील करता है ,उसका मन पाप में रमण करने लगता है !
१७. जो काम को करने के बाद पछताना पड़े , उसे करना अच्छा नहीं, जिसका फल अश्रु मुख होकर सेवन करना पड़ें!
१८. पापी भी सुख भोगता रहता है , जब तक उसका पाप कर्म नहीं पकता ,लेकिन जब उसका पाप कर्म पकता है, तब वह दुःख भोगता है !
१९. कोई आदमी बुराई को छोटा न समझे और दिल में यह न सोचे कि यह मुझ तक नही पहुच सकेगी ! पानी की बूंदों के गिरने से भी एक पानी का घड़ा भर जाता है ! इसी प्रकार थोडा थोडा पाप कर्म करने से भी मुर्ख आदमी पाप से भर जाता है !
२०. आदमी को शुभ कर्म करने में जल्दी करनी चाहिए और मं को बुराई से दूर रखना चाहिए !यदि आदमी शुभ कर्म को करने में ढील करता है तो उसका मं पाप में रमण करने में लग जाता है !
२१. यदि एक आदमी पाप करे ,तो वह बार बार न करे ! वह पाप में आनंद न माने ! पाप इकठ्ठा होकर दुःख देता है !
२२. कुशल कर्म करे ,अकुशल कर्म न करे ! कुशल कर्म करने वाला इस लोक में सुखपूर्वक रहता है !
२३. कामुकता से दुख पैदा होता है , कामुकता से भय पैदा होता है ! जो कामुकता से एकदम मुक्त है , उसे न दुःख है न भय !
२४. भूख सबसे बड़ा रोग है , संस्कार सबसे बड़ा दुःख है ! जो इस बात को जान लेता है ,उसके लिए निर्वाण साबसे बड़ा सुख है !
२५. स्वयं-कृत,स्वयं-उत्पन्न तथा स्वयं पोषित पाप कर्म ,करने वाले को ऐसे ही पीस डालता है ,जैसे वज्र मूल्यवान मणि को !
२६. जो आदमी अत्यंत दुशील होता है ,वह अपने आप को उस स्थिति में पहुचा देता है ,जहाँ उसका शत्रु उसे चाहता है ! ठीक वैसे ही जैसे अआकाश-बेल उस वृक्ष को ,जिसे वह घेरे रहती है !
२७. अकुशल कर्म तथा अहितकर कर्म करना आसान है ! कुशल कर्म तथा हितकर कर्म करना कठिन है !
२. यही बौद्ध जीवन मार्ग है !
३. यदि आदमी शुभ कर्म करे ! तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए ! उसी में चित्त लगाना चाहिए ! शुभ कर्मो का संचय सुखकर होता है !
४. भलाई के बारे में यह मत सोचो कि मै इसे प्राप्त न कर सकूंगा ! बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है ! इसी प्रकार थोडा-थोडा करके बुद्धिमान आदमी बहुत शुभ कर्म कर सकता है !
५. जिस काम को करके आदमी को पछताना न पड़े और जिसके फल को वह आनंदित मन से भोग सके ,उस काम को करना अच्छा है !
६. जिस काम को करके आदमी को अनुताप न हो और जिसके फल को प्रफुल्लित मं से भोग सके ,उस काम को करना अच्छा है !
७. यदि आदमी शुभ कर्म करे ! तो इसे पुनः पुनः करना चाहिए ! उसे उसमे आनन्दित होना चाहिए !शुभ कर्म का करना आनन्ददायक होता है !
८. अच्छे आदमी को भी बुरे दिन देखने पड़ जाते है ,जब तक उसे अपने शुभ कर्मो का फल मिलना आरम्भ नहीं होता ; लेकिन जब उसे अपने शुभ कर्मो का फल मिलना आरम्भ होता है ,तब अच्छा आदमी अच्छे दिन देखता है !
९. भलाई के बारे में यह कभी न सोचे कि मै इसे प्राप्त न कर सकूंगा ! जिस प्रकार बूंद बूंद पानी करके घड़ा भर जाता है ,उसी प्रकार थोडा-थोडा करके भी भला आदमी भलाई से भर जाता है !
१०. शील (सदाचार ) की सुगंध चन्दन, तगर तथा मल्लिका –सबकी सुगंध से बडकर है !
११. धुप और चन्दन की सुगंध कुछ ही दूर तक जाती है ,किन्तु शील की सुगंध बहुत दूर तक जाती है !
१२. बुराई के बारे में यझ न सोचे कि यह मुझ तक नही पहुचेगी !जिस प्रकार बूंद बूंद करके पानी का घड़ा भर जाता है ,इसी प्रकार थोडा-थोडा अशुभ कर्म भी बहुत हो जाते है !
१३. कोई भी ऐसा काम करना अच्छा नही ,जिसे करने से पछताना हो और जिस का फल अश्रु मुख होकर रोते हुए भोगना पड़े!
१४. यदि कोई आदमी दुष्ट मं से कुछ बोलता है या कोई काम करता है ,तो दुख: उसके पीछे-पीछे ऐसे ही हो लेता है ,जैसे गाडी का पहिया खीचने वाले (पशु)के पीछे पीछे !
१५. पाप कर्म न करें !अप्रमाद से बचें ! मिथ्या दृष्टी न रखे !
१६. शुभ कर्मो में अप्रमादी हो !बुरे विचारों का दमन करें !जो कोई शुभ कर्म को करने में ढील करता है ,उसका मन पाप में रमण करने लगता है !
१७. जो काम को करने के बाद पछताना पड़े , उसे करना अच्छा नहीं, जिसका फल अश्रु मुख होकर सेवन करना पड़ें!
१८. पापी भी सुख भोगता रहता है , जब तक उसका पाप कर्म नहीं पकता ,लेकिन जब उसका पाप कर्म पकता है, तब वह दुःख भोगता है !
१९. कोई आदमी बुराई को छोटा न समझे और दिल में यह न सोचे कि यह मुझ तक नही पहुच सकेगी ! पानी की बूंदों के गिरने से भी एक पानी का घड़ा भर जाता है ! इसी प्रकार थोडा थोडा पाप कर्म करने से भी मुर्ख आदमी पाप से भर जाता है !
२०. आदमी को शुभ कर्म करने में जल्दी करनी चाहिए और मं को बुराई से दूर रखना चाहिए !यदि आदमी शुभ कर्म को करने में ढील करता है तो उसका मं पाप में रमण करने में लग जाता है !
२१. यदि एक आदमी पाप करे ,तो वह बार बार न करे ! वह पाप में आनंद न माने ! पाप इकठ्ठा होकर दुःख देता है !
२२. कुशल कर्म करे ,अकुशल कर्म न करे ! कुशल कर्म करने वाला इस लोक में सुखपूर्वक रहता है !
२३. कामुकता से दुख पैदा होता है , कामुकता से भय पैदा होता है ! जो कामुकता से एकदम मुक्त है , उसे न दुःख है न भय !
२४. भूख सबसे बड़ा रोग है , संस्कार सबसे बड़ा दुःख है ! जो इस बात को जान लेता है ,उसके लिए निर्वाण साबसे बड़ा सुख है !
२५. स्वयं-कृत,स्वयं-उत्पन्न तथा स्वयं पोषित पाप कर्म ,करने वाले को ऐसे ही पीस डालता है ,जैसे वज्र मूल्यवान मणि को !
२६. जो आदमी अत्यंत दुशील होता है ,वह अपने आप को उस स्थिति में पहुचा देता है ,जहाँ उसका शत्रु उसे चाहता है ! ठीक वैसे ही जैसे अआकाश-बेल उस वृक्ष को ,जिसे वह घेरे रहती है !
२७. अकुशल कर्म तथा अहितकर कर्म करना आसान है ! कुशल कर्म तथा हितकर कर्म करना कठिन है !


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